Friday, September 3, 2010

सरकारी नीतियां

कागजों पर ही शुरू होती हैं,
कागजों पर ही ख़त्म होती हैं ।
सरकारी नीतियां इसी तरह,
बनती और बिगडती हैं ।
होके फाईलो मे कैद,
रास्ता अपना खोजती हैं ।
सरकारी नीतियां इसी तरह,
बनती और बिगडती हैं ।
भूली बिसरी बात बनकर,
वक़्त की गर्त मे दबी रहती हैं।
सरकारी नीतियां इसी तरह,
बनती और बिगडती हैं ।
फिर दम तोड़ देती हैं एक दिन,
इतिहास बनके रहा करती हैं ।
सरकारी नीतियां इसी तरह,
बनती और बिगडती हैं।
कागजों पर ही शुरू होती हैं,
कागजों पर ही ख़त्म होती हैं।
सरकारी नीतियां इसी तरह,
बनती और बिगडती हैं ।

4 comments:

  1. sahi aur bilkul satik rachna!

    sarkari nitiya agar sahi se implement ho to hamara desh phir se sone ki chirriya ho jaaye!

    par inki nitiya to hoti hi hai thik waisi jaisa aapne likha hai..."कागजों पर ही शुरू होती हैं,
    कागजों पर ही ख़त्म होती हैं।
    सरकारी नीतियां इसी तरह,
    बनती और बिगडती हैं "

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  2. सत्य को कहती अच्छी रचना

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  3. बहुत सुन्दर और शानदार प्रस्तुती!
    शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

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  4. आपको एवं आपके परिवार को गणेश चतुर्थी की शुभकामनायें ! भगवान श्री गणेश आपको एवं आपके परिवार को सुख-स्मृद्धि प्रदान करें !

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