Friday, May 4, 2012

Ganga ki pukaar

जभी  दिल  पर  बढ़  जाता  हैं पाप  का  बोझ,
चल  पड़ते  हैं  सभी  गंगा  की  और.
सोचा  मैंने  भी  जाऊं  मैं  वहां, जहाँ  जाते  हैं  सभी,
जीते जी  या  फिर  कर  के  देह  को  त्याग.
ज्यूँ  ही  पंहुचा .....ठिठक  गए  मेरे  कदम,
देख  के  एक  दृश्य  असामान्य.
एक  मोटी  सी  काली  स्याह  चादर  में,
लिपटी  थी  वो उज्जवल  पावन  लहर,
और  थे  उस  पर  छितरे  दूर -दूर  तक
इंसानी  ढाचों  के  अवशेष.
पास  जाके  सुना  तो एक  दबी  सी
आवाज़  आई.
हटा  दो ....हटा  दो....इस  चादर  को  मुझ  पर से
मैं  हूँ  तुम्हारी  जीवनदायिनी.

8 comments:

  1. स्तब्ध कर देती रचना...वाह...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  2. गंगा का दुःख..प्रभावशाली

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  3. .


    औरों का दुःख अपने ऊपर लेने वालों की पीड़ा समझना हर किसी के लिए सहज संभव नहीं है …
    मोक्षदायिनी गंगा मैया की पुकार करुणा भरी है …


    शुभकामनाओं सहित…

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  4. Accha likha hai aapne Sheetal ji.. wakayi bahut dukh hota hai Ganga ki paristhiti dekhkar...

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  5. गंगा दूसरों के पाप कैसे नष्ट कर पाएगी जब कि लोगों ने उसे इतना दूषित कर दिया है ...बहुत संवेदनशील रचना

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  6. बहुत बढ़िया ,एक नदी के लिए कोई ऐसा सोचे तभी वो गंगा बनी रहे

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  7. वाह शीतल तुम्हारा ब्लॉग भी है और इतनी बढ़िया कविता भी लिखती हो आज ही पता चला .

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