बेगुन्हा लाशों को कंधे पर डाले ।
चले है राम और खुदा उन्हें दफनाने ॥
मंदिर , मस्जिद आशियाँ हुआ करते थे ।
आज भटक रहे है वीरानो में ॥
दिल से निकाल फेंका है लोगों ने हमको ।
अब तो हम उनके नारों में रहा करते है ॥
नफरत की इस आंधी के थपेड़ो मे ।
अपने अस्तित्व का अंश ढूँढ़ते नज़र आते है ॥
जब धर्म अपनी आस्था से बहार निकलकर सत्ता की सीढ़ी बन जाता है, तो उसका परिणाम कुछ ऐसा ही होता है, बहरहाल, बहुत ही भावपूर्ण कविता लगी...
ReplyDelete