Monday, May 16, 2011

धर्म

राम,अल्लाह, नानक, येशु और साईं,
यह सब ही हैं सर्व शक्तिमान।
कभी नहीं करते हैं यह,
आपस में कोई भेद -भाव ।
पर इनके बन्दे हम इन्सान,
कब समझ पायेंगे यह बात।
कोई धर्म न नीचा होता हैं न ऊंचा,
सारे ही होते हैं एक समान।
लड़ो न तुम आपस में,
न बढाओ तुम कोई विवाद ।
चाहे मंदिर बने या मस्जिद रहे,
इससे क्या फर्क पड़ता हैं ।
हर पूजा या इबादत का स्थान,
हमेशा ही पवित्र होता हैं .

Wednesday, March 2, 2011

महाशिवरात्रि के इस पावन पर्व पर,
सभी शिव-भक्त को महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनएँ
एक छोटा सा भजन इस पावन मौके पर।

जीवन सार्थक करे शिव का नाम।
शिव-चरण बिन कहाँ विश्राम॥

हर -हर महादेव नाम का करो स्नान,
शिव-चरण बिन कहाँ विश्राम।

जीवन सार्थक करे शिव का नाम।
शिव-चरण बिन कहाँ विश्राम॥

डमरू की डम-डम मे शम्भो नाम,
शिव -चरण बिन कहाँ विश्राम।

जीवन सार्थक करे शिव का नाम।
शिव -चरण बिन कहाँ विश्राम ॥

गंगा की धार बोले शंकर नाम,
शिव-चरण बिन कहाँ विश्राम।

जीवन सार्थक करे शिव का नाम।
शिव -चरण बिन कहाँ विश्राम॥

तुम्ही गुरु,तुम्ही परमपिता,
शिव -चरण बिन कहाँ विश्राम।

जीवन सार्थक करे शिव का नाम।
शिव -चरण बिन कहाँ विश्राम॥

ॐकार नाम से गूंजे सारा संसार,
शिव -चरण बिन कहाँ विश्राम।

जीवन सार्थक करे शिव का नाम।
शिव -चरण बिन कहाँ विश्राम॥

तीन लोक मे तेरी जय -जयकार,
शिव -चरण बिन कहाँ विश्राम।

जीवन -सार्थक करे शिव का नाम।
शिव -चरण बिन कहाँ विश्राम॥

Monday, February 7, 2011

अरमान

सीने मैं जब्त कर रखे हैं,
अरमान कई मैंने अपने।
जुबा खोल दू तो ये,
कही खाक मैं मिल न जाये।
जमाना जान जाता हैं कैसे,
बंद जुबा की ये बातें।
नश्तर चुभो -चुभो कर इसे,
घायल ही करता जाये।
दिल के किसी तह मैं,
छुपा लिया हैं इसको मैंने ।
मासूम सी यह चाह मेरी,
कही टूट कर बिखर ना जाये।

Monday, December 27, 2010

जिंदगी के आईने से,
हटाके वक़्त की गर्त ।
देखा जो हमने सामने,
अपने बीते लम्हों का अक्स ।
चाहा नहीं था जिसे देखना,
आगया वो हमें नज़र।
दरकते हुए कई ख्वाबो का,
एक खामोश सा मंजर।

Tuesday, November 30, 2010

उगता सूरज

मखमली घास सा उगता सूरज।
माँ के कोमल स्पर्श जैसा उगता सूरज।
मासूम सी मुस्कान बिखेरता उगता सूरज ।
ऊँगली पकड़ नयी राह दिखाता उगता सूरज ।
चुनोतियों के पथ ले जाता उगता सूरज ।
सफलता की मंजिल पर पहुंचाता उगता सूरज ।

Tuesday, November 16, 2010

घोटाले

आदर्शवादी होने का दम हैं भरते,
आदर्शो का ढोल हैं पीटते।
किन आदर्शो की राह पर चलकर,
कैसे -कैसे आदर्श घोटाले करते।
खेल धोखेधडी और स्वार्थ का खेलते,
खेल,खेल की भावनाओ से खेलते।
अब खेल होता हैं खत्म तुम्हारा,
अब बेकार की सफाई , क्यूँ देते फिरते।

Monday, November 8, 2010

संघर्ष

संघर्ष भट्टी एक आग की,
जिसमे हम खुद को तपाया करते हैं।
तप कर इस अग्नि मे,
हम कुंदन बन जाया करते हैं ।
संघर्ष एक विशाल महासागर गहरा,
जिसमे हम खुद को डूबाया करते हैं।
डूब कर इस सागर मे,
हम मोती चुन लाया करते हैं ।
संघर्ष एक राह कांटो की,
जिसमे हम खुद को चलाया करते हैं।
चल कर इस राह मे,
हम मंजिल को पा जाया करते हैं ।