खयालो की भाप से बने,
उमंगो और आशाओ के बादल।
ख्वाबो के आसमान में ठहरकर,
बरसेंगे खुशियों की बरसात बनकर ।
Tuesday, September 14, 2010
Friday, September 3, 2010
सरकारी नीतियां
कागजों पर ही शुरू होती हैं,
कागजों पर ही ख़त्म होती हैं ।
सरकारी नीतियां इसी तरह,
बनती और बिगडती हैं ।
होके फाईलो मे कैद,
रास्ता अपना खोजती हैं ।
सरकारी नीतियां इसी तरह,
बनती और बिगडती हैं ।
भूली बिसरी बात बनकर,
वक़्त की गर्त मे दबी रहती हैं।
सरकारी नीतियां इसी तरह,
बनती और बिगडती हैं ।
फिर दम तोड़ देती हैं एक दिन,
इतिहास बनके रहा करती हैं ।
सरकारी नीतियां इसी तरह,
बनती और बिगडती हैं।
कागजों पर ही शुरू होती हैं,
कागजों पर ही ख़त्म होती हैं।
सरकारी नीतियां इसी तरह,
बनती और बिगडती हैं ।
कागजों पर ही ख़त्म होती हैं ।
सरकारी नीतियां इसी तरह,
बनती और बिगडती हैं ।
होके फाईलो मे कैद,
रास्ता अपना खोजती हैं ।
सरकारी नीतियां इसी तरह,
बनती और बिगडती हैं ।
भूली बिसरी बात बनकर,
वक़्त की गर्त मे दबी रहती हैं।
सरकारी नीतियां इसी तरह,
बनती और बिगडती हैं ।
फिर दम तोड़ देती हैं एक दिन,
इतिहास बनके रहा करती हैं ।
सरकारी नीतियां इसी तरह,
बनती और बिगडती हैं।
कागजों पर ही शुरू होती हैं,
कागजों पर ही ख़त्म होती हैं।
सरकारी नीतियां इसी तरह,
बनती और बिगडती हैं ।
Wednesday, August 25, 2010
अनजानी होती राहे
राहे थी जो पहचानी, अब अनजानी हो रही हैं।
मुझसे मेरी ही ज़मी , अब बेगानी हो रही हैं।
अपनों की बदगुमानी का, आलम हैं कुछ इस तरह।
चेहरे को मेरे देख,इन्हें अब हैरानी हो रही हैं ।
बन गया हूँ मुसाफिर, एक भटके हुए सफ़र का ।
राहे जिंदगानी की, इस कदर क्यूँ वीरानी हो रही हैं ।
मुझसे मेरी ही ज़मी , अब बेगानी हो रही हैं।
अपनों की बदगुमानी का, आलम हैं कुछ इस तरह।
चेहरे को मेरे देख,इन्हें अब हैरानी हो रही हैं ।
बन गया हूँ मुसाफिर, एक भटके हुए सफ़र का ।
राहे जिंदगानी की, इस कदर क्यूँ वीरानी हो रही हैं ।
Saturday, August 14, 2010
आज़ादी का जश्न
आज़ादी का जश्न मनाते हो।
क्या सच मे जश्न मनाने की बात है ?
कही जलता है चूल्हा,कही होता है फाका।
अनाज चाहे पड़ा सड़ता रहे,
दाने -दाने को तरसता है इन्सान।
फिर भी हम नारे लगाते है,
'मेरा भारत महान'।
आज़ादी का जश्न मनाते हो।
क्या सच मे जश्न मनाने की बात है?
कोई रहता आलिशान मकान मे।
कोई तंगहाल बस्ती मे।
आसमान के तले कोई बसाता अपना जहां।
फिर भी हम नारे लगाते है,
'मेरा भारत महान'।
आज़ादी का जश्न मनाते हो।
क्या सच मे जश्न मनाने की बात है ?
ताकतवर अयोग्य पाते है ऊंचा मुकाम।
योग्य आम आदमी रह जाता है मूंह ताक ।
बेरोज़गारी के इस आलम की क्या कहे बात।
फिर भी हम नारे लगाते हे,
'मेरा भारत महान'।
आज़ादी का जश्न मनाते हो,
क्या सच मे जश्न मनाने की बात हे?
कही बिजली की चकाचोंध ।
कही टिम-टिम करती जलती लालटेन ।
तो कही दिन और रात होते हे एक समान ।
फिर भी हम नारे लगाते हे,
'मेरा भारत महान'।
आज़ादी का जश्न मनाते हो।
क्या सच मे जश्न मनाने की बात हे ?
घूसखोरी,भ्रष्टाचार,बेईमानी का दीमक,
इन्सान को अब रहा खा ।
कहाँ करे जनता अब अपनी फरियाद ।
फिर भी हम नारे लगाते हे ,
'मेरा भारत महान'।
आज़ादी का जश्न मनाते हो।
क्या सच मे जश्न मनाने की बात हे?
क्या सच मे जश्न मनाने की बात है ?
कही जलता है चूल्हा,कही होता है फाका।
अनाज चाहे पड़ा सड़ता रहे,
दाने -दाने को तरसता है इन्सान।
फिर भी हम नारे लगाते है,
'मेरा भारत महान'।
आज़ादी का जश्न मनाते हो।
क्या सच मे जश्न मनाने की बात है?
कोई रहता आलिशान मकान मे।
कोई तंगहाल बस्ती मे।
आसमान के तले कोई बसाता अपना जहां।
फिर भी हम नारे लगाते है,
'मेरा भारत महान'।
आज़ादी का जश्न मनाते हो।
क्या सच मे जश्न मनाने की बात है ?
ताकतवर अयोग्य पाते है ऊंचा मुकाम।
योग्य आम आदमी रह जाता है मूंह ताक ।
बेरोज़गारी के इस आलम की क्या कहे बात।
फिर भी हम नारे लगाते हे,
'मेरा भारत महान'।
आज़ादी का जश्न मनाते हो,
क्या सच मे जश्न मनाने की बात हे?
कही बिजली की चकाचोंध ।
कही टिम-टिम करती जलती लालटेन ।
तो कही दिन और रात होते हे एक समान ।
फिर भी हम नारे लगाते हे,
'मेरा भारत महान'।
आज़ादी का जश्न मनाते हो।
क्या सच मे जश्न मनाने की बात हे ?
घूसखोरी,भ्रष्टाचार,बेईमानी का दीमक,
इन्सान को अब रहा खा ।
कहाँ करे जनता अब अपनी फरियाद ।
फिर भी हम नारे लगाते हे ,
'मेरा भारत महान'।
आज़ादी का जश्न मनाते हो।
क्या सच मे जश्न मनाने की बात हे?
Tuesday, August 10, 2010
Tuesday, August 3, 2010
काश्मीर
जन्नत कहलाने वाले चमन की हालत तो देखिये,
जहाँ जिंदगी बसती थी वहां सन्नाटा तो देखिये ।
यार वो कभी जो अपनी यारी का दम भरते थे,
आज इस कदर वहशी हो गए हैं।
हाथो मे लेकर के खंजर,
अपने ही खून के प्यासे हो गए हैं।
जहाँ जहाँ भी नजरे जाती हैं,
बर्बादी के साए नजर आते हैं ।
और अपने ही लोग मुझे,
जाने अब क्यूँ पराये नज़र आते हैं ।
जहाँ जिंदगी बसती थी वहां सन्नाटा तो देखिये ।
यार वो कभी जो अपनी यारी का दम भरते थे,
आज इस कदर वहशी हो गए हैं।
हाथो मे लेकर के खंजर,
अपने ही खून के प्यासे हो गए हैं।
जहाँ जहाँ भी नजरे जाती हैं,
बर्बादी के साए नजर आते हैं ।
और अपने ही लोग मुझे,
जाने अब क्यूँ पराये नज़र आते हैं ।
Tuesday, July 20, 2010
मेरा मेरा करते हो,यहाँ कुछ भी तो अपना नहीं।
यह शरीर किराये का ढांचा है, और साँसे है उधार की ।
सब कुछ पाकर भी,न जाने क्या पाने की होड़ लगी है ।
बुझती नहीं है जो कभी,यह कैसी प्यास जगी है।
इस मृगतृष्णा का, हर कोई बना दीवाना है ।
यह शरीर किराए का ढांचा है, और साँसे है उधार की ।
दो गज ज़मी के नीचे ही,हमको दफन हो जाना है।
राख बन इस देह को, अब मिटटी मे मिल जाना है।
सब कुछ जानकार भी,इन्सान क्यूँ बना बेगाना है।
यह शरीर किराए का ढांचा है, और साँसे है उधार की।
मेरा मेरा करते हो, यहाँ कुछ भी तो अपना नहीं।
यह शरीर किराए का ढांचा है,और साँसे है उधार की ।
यह शरीर किराये का ढांचा है, और साँसे है उधार की ।
सब कुछ पाकर भी,न जाने क्या पाने की होड़ लगी है ।
बुझती नहीं है जो कभी,यह कैसी प्यास जगी है।
इस मृगतृष्णा का, हर कोई बना दीवाना है ।
यह शरीर किराए का ढांचा है, और साँसे है उधार की ।
दो गज ज़मी के नीचे ही,हमको दफन हो जाना है।
राख बन इस देह को, अब मिटटी मे मिल जाना है।
सब कुछ जानकार भी,इन्सान क्यूँ बना बेगाना है।
यह शरीर किराए का ढांचा है, और साँसे है उधार की।
मेरा मेरा करते हो, यहाँ कुछ भी तो अपना नहीं।
यह शरीर किराए का ढांचा है,और साँसे है उधार की ।
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