बचपन की गलियों से हर कोई गुजरता है,
खुबसूरत इन राहों मे हर कोई विचरता है ।
जैसे -जैसे उम्र बढती चली जाती है,
यथार्थ की दुनिया मे हमें लिए जाती है।
अब तो बचपन ख्वाबो -ख्यालों मे बसा है,
यादों की किताबो मे इन लम्हों को संजोया है ।
Friday, July 9, 2010
Thursday, July 1, 2010
नौकरी की तलाश .
राह मे एक नौजवा से मुलाक़ात हो गयी,
बातो बातो मे उसकी कहानी पता चल गयी।
कहानी कोई नयी नहीं वही पुरानी ही थी,
उस नौजवा को एक अदद नौकरी की तलाश थी ।
आँखों मे चमक उसके दिल मे तमन्नाए हज़ार थी,
अपनी काबिलियत पर उसे नौकरी मिलने की आस थी ।
नौकरी की तलाश मे वो जहाँ -जहाँ जाता,
तारीफ़ अपनी काबिलियत की वो हर जगह पाता ।
पर अंत मे उससे एक ही सवाल पूछा जाता,
क्या किसी की सिफारिश है आपके पास ।
इसी तरह नौकरी की तलाश मे दिन बीतने लगे ,
पहले हफ्ते,महीने, फिर बरस बीत गए ।
अब वो नौजवा अखबार बेचने का काम कर रहा है,
और आज भी अपने लिए नौकरी की तलाश कर रहा है।
बातो बातो मे उसकी कहानी पता चल गयी।
कहानी कोई नयी नहीं वही पुरानी ही थी,
उस नौजवा को एक अदद नौकरी की तलाश थी ।
आँखों मे चमक उसके दिल मे तमन्नाए हज़ार थी,
अपनी काबिलियत पर उसे नौकरी मिलने की आस थी ।
नौकरी की तलाश मे वो जहाँ -जहाँ जाता,
तारीफ़ अपनी काबिलियत की वो हर जगह पाता ।
पर अंत मे उससे एक ही सवाल पूछा जाता,
क्या किसी की सिफारिश है आपके पास ।
इसी तरह नौकरी की तलाश मे दिन बीतने लगे ,
पहले हफ्ते,महीने, फिर बरस बीत गए ।
अब वो नौजवा अखबार बेचने का काम कर रहा है,
और आज भी अपने लिए नौकरी की तलाश कर रहा है।
Friday, June 25, 2010
मन का पंछी .
मन का पंछी विचारो की भूल -भूलैया मे,
सदा यू ही भटका फिरा ।
रिवाजो की बंदिशों मे ही,
अपने आप को जकड़ा रहा।
लाख पंख फडफड़ाये तो भी,
रास्ता नहीं कोई सूझ रहा।
समझोते की दीवार को ले,
ख़ामोशी से टिका रहा ।
सदा यू ही भटका फिरा ।
रिवाजो की बंदिशों मे ही,
अपने आप को जकड़ा रहा।
लाख पंख फडफड़ाये तो भी,
रास्ता नहीं कोई सूझ रहा।
समझोते की दीवार को ले,
ख़ामोशी से टिका रहा ।
Wednesday, June 23, 2010
बरखा का मौसम .
गर -गर -गर -गर बदरा गरजे ।
चम-चम -चम -चम बिजुरिया चमके।
सन -सन -सन -सन चले हवा ।
रिमझिम -रिमझिम पड़े फुहार ।
पपीहे ने मचाया शोर ।
मोर नाचे भाव -विभोर ।
प्यासी धरती ने प्यास बुझाई ।
चारो तरफ हरियाली छाई
खिल उठे सबके तन-मन ।
आया जो ये बरखा का मौसम ।
चम-चम -चम -चम बिजुरिया चमके।
सन -सन -सन -सन चले हवा ।
रिमझिम -रिमझिम पड़े फुहार ।
पपीहे ने मचाया शोर ।
मोर नाचे भाव -विभोर ।
प्यासी धरती ने प्यास बुझाई ।
चारो तरफ हरियाली छाई
खिल उठे सबके तन-मन ।
आया जो ये बरखा का मौसम ।
Friday, June 18, 2010
Thursday, June 10, 2010
जिंदगी क्या है ...
जिंदगी क्या है ......इसका वर्णन हर कोई अपने हिसाब से करता है । मैंने भी अपने तरीके से जिंदगी का वर्णन किया है।
जिंदगी पटरी है ,साँसों के पहियों पर दौड़ती,
लम्हों की रेल है।
जिंदगी दरिया है,साँसों की लहरों पर चलती,
लम्हों की कश्ती है।
जिंदगी जमीन है,साँसों की नीव पर बसी,
लम्हों का आशिया है।
जिंदगी किताब है, साँसों की कलम से लिखी,
लम्हों की दास्ताँ है।
जिंदगी संगीत है, साँसों के स्वरों से सजी,
लम्हों का गीत है।
जिंदगी रंगशाला है,साँसों के इशारों पर रचित,
लम्हों का खेल है।
जिंदगी एक बाग़ है, साँसों की खुशबु से महकी,
लम्हों के फूल है।
जिंदगी पटरी है ,साँसों के पहियों पर दौड़ती,
लम्हों की रेल है।
जिंदगी दरिया है,साँसों की लहरों पर चलती,
लम्हों की कश्ती है।
जिंदगी जमीन है,साँसों की नीव पर बसी,
लम्हों का आशिया है।
जिंदगी किताब है, साँसों की कलम से लिखी,
लम्हों की दास्ताँ है।
जिंदगी संगीत है, साँसों के स्वरों से सजी,
लम्हों का गीत है।
जिंदगी रंगशाला है,साँसों के इशारों पर रचित,
लम्हों का खेल है।
जिंदगी एक बाग़ है, साँसों की खुशबु से महकी,
लम्हों के फूल है।
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